एक समय था जब पक्षी रंग-बिरंगे ना होकर ब्लैक एंड वाइट हुआ करते थे। वे एक दूसरे को देखकर महसूस करते थे कि हमारे जीवन में कोई रंग नहीं है। कितनी ब्लैक एंड वाइट एवं बोरिंग है हमारी लाइफ। उन सभी पक्षियों ने एक मीटिंग निर्धारित की एवं उसमें पक्षी मोर को अपना नेता चुना। मीटिंग में यह निर्णय लिया गया कि हम सभी पक्षी यज्ञ करेंगे, पूजा-पाठ एवं तपस्या करके ईश्वर को प्रसन्न करेंगे एवं अपनी कामना पूर्ति का आग्रह करेंगे। ऐसा ही हुआ सभी ने तपस्या की एवं ईश्वर के प्रकट होने पर अपनी कामना बताई कि हमें भी जीवन में रंग चाहिए जैसे आपने हमें मधुर आवाजें दी हैं, सुंदर शरीर और विभिन्न आकार एवं क्वालिटीज दी है। उसी प्रकार हमारे शरीर को भिन्न-भिन्न रंग भी दीजिए जिससे हम अधिक सुंदर व आकर्षक बन सके व हमारा जीवन अधिक रसमय बन सके। भगवान ने कहा ठीक है मैं तुम्हें रंगीन बनाने हेतु सभी रंग एवं रंग भरने की कला मोर को दूंगा एवं वे ही यह निश्चय करेंगे कि किसको किस किस रंग से कैसा भरना है। सभी पक्षी व मोर ईश्वर की इस आज्ञा को मानकर योजनाबद्ध तरीके से पालन करने लगे। पक्षी एक एक कर मोर के द्वारा अपने शरीर पर रंग भरवाने लगे मोर भी अपनी ईश्वर के द्वारा दी हुई कला, बुद्धिमत्ता से सीमित रंगों द्वारा पक्षियों के आकार प्रकार देखकर उन्हें रंगीन बनाने लगा। प्रत्येक पक्षी रंग भरवा कर अपने को दर्पण में निहार कर वे इसे ईश्वर का आशीर्वाद समझकर खुश होते और उड़ान भरते ऐसा करते-करते मोर ने सीमित रंगों के बजट के हिसाब से सभी को ईश्वर का रंग रूपी प्रसाद व आशीर्वाद दिया। परंतु मोर ने अपना ध्यान नहीं रखा कि मेरे लिए कोई रंग बचा है कि नहीं। ऐसा ही हुआ जब सभी पक्षी रंगीन बना दिए गए तब रंग खत्म हो गए एवं मोर के लिए कुछ भी नहीं बचा। वह दुखी होता कि वह ब्लैक एंड वाइट रह गया इससे पहले ही एक पक्षी ने कहा कि आप तो हम सभी पक्षियों में सबसे ज्यादा रंगीन हो, उसे यकीन नहीं हुआ पर जब उसने दर्पण में देखा तो वह बहुत प्रसन्न हुआ एवं नाचने लगा। जब उसने सोचा कि यह कैसे संभव हुआ तब उसे याद आया जब मैं सभी पक्षियों का ब्रश से भिन्न-भिन्न रंगों से पेंट कर रहा था तब मैं अपनी शरीर पर लगा कर चेक कर रहा था। इस प्रकार सभी पक्षियों को रंगीन बनाते बनाते मैं भी रंगीन बन गया। मोर ने अनुमान लगाया कि मैंने ईश्वर के दिए हुए इस कार्य को ईमानदारी व सच्ची लगन से किया तो ईश्वर ने मेरे साथ भी न्याय किया व मैं भी अन्य पक्षियों की तरह ईश्वर के दिए हुए आशीर्वाद को प्राप्त कर पाया। मोर की भांति हमें भी निस्वार्थ भाव से निष्ठा व तन्मयता से परोपकार में लगे रहना चाहिए।

 तुलसीदासजी श्रीरामचरितमानस में लिखते हैं कि

“ परहित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई। ”

  “Best experience ever! I found the ambiance at Lucca’s to be very warm & charming. ”